आज क्यों मनाया जाता है यौम-ए-आशूरा, यानी 10 मुहर्रम

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आज मुहर्रम का दसवां दिन है आज के दिन को यौम-ए-आशूरा कहा जाता है मुस्लिम समुदाय के लोग कर्बला की जंग में शहादत पाने वालों के लिए मातम मनाते हैं आइए जानते हैं यौम-ए-आशूरा व कर्बला की जंग का इतिहास मुहर्रम

Muharram की दसवीं तारीख (यौम-ए-आशूरा) है. इस दिन शिया समुदाय के लोग काले रंग के वस्त्र पहनते हैं और कर्बला की जंग में शहादत देने वालों के लिए मातम मनाते हैं आज के दिन शिया समुदाय ताजिया निकालते हैं मजलिस पढ़ते हैं और दुख जाहिर करते हैं वही जबकि सुन्नी समुदाय के लोग रोजा रखते हैं और नमाज अदा करते हैं मुहर्रम इस्लामिक कैलेंडर का पहला मां है जो रमजान की तरह ही पवित्र माना जाता है आइए जानते हैं क्या है यौम-ए-आशूरा व कर्बला की जंग का इतिहास.

यौम-ए-आशूरा (Ashura) 10 Muharram

मोहर्रम की यौम-ए-आशूरा को इराक के कर्बला शहर में पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन ने इस्लाम की रक्षा के लिए अपने 72 साथियों के साथ शहीद हो गए थे. इस वजह से हर साल मोहर्रम (Muharram) की दसवीं तारीख को हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद करके मातम मनाया जाता है

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आखिर क्यों हुई थी कर्बला में जंग

पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के उत्तराधिकारी के रूप में यजीद के नाम की घोषणा उसके पिता ने कर दी लेकिन इसको पैगंबर साहब के परिवार ने स्वीकार नहीं किया. मान्यता ना मिलने के कारण पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन और यजीद के बीच जंग शुरू हो गई.

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यजीद खुद को सरकार मान लिया था और अपने हिसाब से सभी धार्मिक गतिविधियों को मानने का दबाव डालता था. इमाम हुसैन ने यजीद की बात नहीं मानी हजरत इमाम हुसैन अपने परिवार और 72 साथियों के साथ कर्बला पहुंच गए.

यजीद शासक के रूप में बेहद ही क्रूर व्यक्ति था इमामे हुसैन को अपने अनुसार चलाने के लिए यजीद ने कई प्रकार के दबाव डाले लेकिन वह सफल नहीं हो सका यजीद को इमाम हुसैन और उनके साथी के कर्बला में होने की जानकारी प्राप्त हो गई.

उसने उन पर दबाव बनाने के लिए उनका पानी बंद करवा दिया इमाम हुसैन भी उसके आगे झुकने वाले नहीं थे इस बीच मोहर्रम की दसवीं तारीख यौम-ए-आशूरा को यजीद ने हजरत इमाम हुसैन और उनके परिवार व उनके साथी पर प्रहार कर दिया

इमामे हुसैन और उनके 72 साथियों ने जंग लड़ी और यजीद की सेना का मुकाबला किया. इस्लाम की रक्षा के लिए इमाम हुसैन अपने परिवार और 72 साथियों के साथ शहीद हो गए इस घटना के बाद हर साल (Ashura) 10 Muharram को मुस्लिम समुदाय मातम मनाता है

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