अम्बेडकरनगर: जनपद के अकबरपुर विकासखंड की ग्राम सभा अशरफपुर पखवाड़े में इन दिनों “अदृश्य विकास” का विश्व रिकॉर्ड बनता नजर आ रहा है। गांव में ज़मीन पर सन्नाटा पसरा है, लेकिन मनरेगा की वेबसाइट पर मजदूरों की ऐसी परेड लगी है कि मानो विकास ने डिजिटल अवतार ले लिया हो! आठ मास्टर रोल में कुल 79 मजदूर कार्यरत बताए गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें तो कहीं फावड़ा, गैंती या मिट्टी का ढेर तक नहीं दिखा। हां, वेबसाइट पर जरूर सब कुछ पूरी मेहनत से “होता” नजर आ रहा है। लगता है यहां काम धरती पर नहीं, सीधे डेटा क्लाउड में हो रहा है!
एक ही फोटो, कई मास्टर रोल, वहीं मजदूर?
मामले में ट्विस्ट तब आया जब आरोप लगा कि एक ही फोटो कई मास्टर रोल में अपलोड कर दी गई है। यानी एक फोटो – कई ड्यूटी! नियम कहता है कि एक मजदूर एक समय में एक ही कार्यस्थल पर काम करेगा, लेकिन यहां तो लगता है कोई “सुपर मजदूर” कई जगहों पर एक साथ उपस्थित है। विज्ञान भी सोच में पड़ जाए!
फोन की घंटी और प्रशासन की खामोशी
जब ग्राम पंचायत सचिव से फोन पर पूछना चाहा गया, तो कॉल ने भी जवाब दे दिया। विकास खंड अधिकारी से संपर्क की कोशिश हुई, तो वहां भी सन्नाटा। लगता है इस मामले में मोबाइल नेटवर्क भी पारदर्शिता की तरह “लो सिग्नल” पर चल रहा है।
सख्त जिलाधिकारी की परीक्षा
यह पूरा मामला ऐसे समय सामने आया है जब जिले के जिलाधिकारी अनुपम शुक्ला वित्तीय अनियमितताओं पर सख्ती दिखा चुके हैं और कई प्रधानों की वित्तीय शक्तियां सीज कर चुके हैं। ऐसे में मुख्यालय के पास ही मनरेगा का यह “कागज़ी कुंभ” प्रशासन के लिए अग्निपरीक्षा बन गया है।
सवाल बड़ा है…
यदि बिना काम के मजदूरी का भुगतान हुआ है, तो मामला सीधे सरकारी धन के दुरुपयोग की श्रेणी में जाएगा। जांच की आंच में ग्राम पंचायत सचिव, ग्राम प्रधान, एपीओ मनरेगा, डीसी मनरेगा और खंड विकास अधिकारी सभी आ सकते हैं।
अब गांव में चर्चा यही है — “यह मनरेगा है या ‘मन-रे-गा’ (मन में रहा गया) योजना?”
जमीन पर अगर काम नहीं, तो वेबसाइट पर यह मेहनत किसने की?
क्या विकास अब अदृश्य मोड में हो रहा है?
जनपद में सुशासन की मुहिम के बीच अशरफपुर पखवाड़े का यह मामला प्रशासन के लिए असली टेस्ट बन सकता है। अब निगाहें जिलाधिकारी के अगले कदम पर टिकी हैं,देखना यह है कि ‘मास्टर रोल महोत्सव’ पर ब्रेक कब लगता है!
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