“अंधा देखे विकास, बहिरा सुने टेंडर” — टांडा ब्लॉक की जोड़ी पर उठे सवाल
अम्बेडकरनगर के टांडा विकासखंड में इन दिनों विकास से ज़्यादा “कमीशन की कहानी” चर्चा में है। कहते हैं, यहां की जोड़ी ऐसी है कि पुरानी कहावत याद आ जाए—एक अंधा, एक बहिरा और एक कोढ़ी मेले में पहुंच गए… और तीनों ने वो-वो देख लिया, सुन लिया और महसूस कर लिया, जो शायद था ही नहीं! कुछ ऐसा ही आरोप लग रहा है टांडा विकासखंड की कार्यशैली पर। चर्चाओं में खंड विकास अधिकारी राघवेंद्र प्रताप सिंह, ब्लॉक प्रमुख सुरजीत वर्मा, जेई/जेएमआई और ब्लॉक के बड़े बाबू की “समन्वित टीम वर्क” की खूब चर्चा है। स्थानीय लोग तंज कसते हुए कहते हैं—
“यहां फाइल चलती नहीं, उड़ती है… और बिल दिखता नहीं, सीधा चढ़ता है!”
टेंडर: खुला भी, बंद भी… पर दिखा नहीं!
बताया जा रहा है कि 25,872 रुपये की एक निविदा का विवरण साइट पर ऐसा अपलोड हुआ कि मानो दूध से धुला कोरा कागज हो। न खुलने की तारीख साफ, न बंद होने की जानकारी। जनता पूछ रही है—टेंडर हुआ कब? खुला कब? या सिर्फ अपलोड ही विकास बन गया?
ई-ग्राम स्वराज पर ‘अंधा बिल’?
ई-ग्राम स्वराज एप पर टांडा क्षेत्र हसनपुर राजमार्ग 233 से जुड़े पिच रोड, मिट्टी व खड़ंजा कार्य के लिए 3,21,462 रुपये का बिल अपलोड दिखाया गया है। आरोप है कि बिल पर न ब्लॉक प्रमुख की स्पष्ट मुहर, न बीडीओ के हस्ताक्षर, न ही एमबी तैयार करने वाले अधिकारी की तस्दीक।
जनता का तंज “जब सिस्टम ही देखना एकन चाहे, तो हस्ताक्षर किसे चाहिए?”
कमीशन का ‘संगीतमय समन्वय’?
स्थानीय लोगों में चर्चाओं का बाजार गर्म यह भी कहा जा रहा है कि एस्टीमेट तैयार होने से लेकर भुगतान तक हर फाइल में “सबका साथ, सबका हिस्सा” का फॉर्मूला चलता है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन चाय की दुकानों से लेकर चौपाल तक यही चर्चा गर्म है। निजी विकास बनाम सार्वजनिक निधि? सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या ब्लॉक प्रमुख निधि से किसी के निजी घर पर खड़ंजा या अन्य कार्य कराए जा सकते हैं? नियम तो कहते हैं कि निधि सार्वजनिक कार्यों के लिए होती है। यदि कहीं निजी संपत्ति पर काम हुआ है तो यह गंभीर जांच का विषय बन सकता है। मीडिया सूत्रों के अनुसार, इस पूरे मामले की पड़ताल जारी है और यह देखा जा रहा है कि निधि से कराए गए कार्य वास्तव में सार्वजनिक उपयोग के हैं या नहीं। ऐसे बहुत मुद्दों का खुलासा हो सकता है
